दिल्ली में बेजुबान जानवरों के लिए काम करने वाली पशु कल्याण कार्यकर्ता जागृति मिश्रा इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा में हैं। वजह है उनका निर्माणाधीन पशु आश्रय, जिसे जेसीबी मशीन से गिरा दिया गया। उनका दावा है कि यह कार्रवाई बिना किसी पूर्व सूचना के हुई और इसके पीछे रिश्वत से इनकार करना था। यह मामला अब पशु-प्रेमियों, आम लोगों और राजनीतिक गलियारों तक पहुंच चुका है।
कौन हैं जागृति मिश्रा?
View this post on Instagram
जागृति मिश्रा दिल्ली में पशु रेस्क्यू और देखभाल का काम करती हैं। वह “Street Worldz Trust” नाम के संगठन से जुड़ी हैं। उनके काम का केंद्र वे जानवर हैं जिन्हें सड़क हादसे, बीमारी या लकवे के कारण सामान्य जीवन जीने में दिक्कत होती है। सोशल मीडिया पर साझा किए गए उनके वीडियो में घायल और लकवाग्रस्त कुत्तों का इलाज, देखभाल और उन्हें सुरक्षित ठिकाना देने की कोशिशें दिखती हैं। इसी वजह से उन्हें बड़ी संख्या में लोगों का समर्थन मिलता रहा है।
दो साल की मेहनत, एक स्थायी ठिकाने का सपना
रिपोर्ट्स के मुताबिक जागृति पिछले करीब दो साल से ऐसे जानवरों के लिए एक स्थायी आश्रय और गौशाला बनाने में जुटी थीं। किराये की जगहों पर इतने जानवर रखना मुश्किल होता है, इसलिए उन्होंने अपनी जमीन पर पक्का शेल्टर बनवाना शुरू किया। उनका कहना है कि इस निर्माण पर लगभग 70 लाख रुपये खर्च हुए थे, जिनमें बड़ा हिस्सा दान और लोगों के सहयोग से जुटाया गया था। यह राशि उन्हीं का दावा है और अभी तक स्वतंत्र रूप से पुष्ट नहीं हुई है।
बुलडोजर चलने का पूरा घटनाक्रम
जागृति के अनुसार, अक्टूबर 2026 में नगर निगम के अधिकारी पुलिस के साथ निर्माण स्थल पर पहुंचे और जेसीबी से निर्माणाधीन ढांचा गिरा दिया। उनका आरोप है कि कार्रवाई से पहले न कोई नोटिस मिला, न अपनी बात रखने का मौका। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में वह मौके पर मौजूद लोगों से कागजात दिखाने की मांग करती और कार्रवाई पर सवाल उठाती नजर आती हैं। मलबे में बदलती इमारत देखकर उनकी बेबसी भी वीडियो में दिखती है।
रिश्वत और राजनीति के आरोप
इस विवाद का सबसे गंभीर पहलू वे आरोप हैं जो जागृति ने लगाए हैं। उनके मुताबिक स्थानीय स्तर पर उनसे पैसे की मांग की गई थी। कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि यह मांग आम आदमी पार्टी से जुड़े एक पार्षद के भाई सोनू डबास ने की। जागृति का दावा है कि इनकार के कुछ दिन बाद ही निर्माण गिरा दिया गया। उन्होंने जूनियर इंजीनियर विकास गुप्ता की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं और मनीष सिसोदिया का नाम लेकर राजनीतिक दखल का आरोप भी लगाया है।
यहां एक बात साफ समझनी जरूरी है: ये सभी आरोप फिलहाल केवल आरोप हैं। इनमें से किसी की भी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। अब तक उपलब्ध जानकारी से यह साबित नहीं होता कि किसी नेता ने कार्रवाई का आदेश दिया या वह इसमें सीधे शामिल था। किसी का नाम वीडियो या पोस्ट में आ जाने भर से वह दोषी नहीं हो जाता। संबंधित अधिकारियों और नेताओं का आधिकारिक पक्ष अभी सामने आना बाकी है।
सोशल मीडिया पर उबाल
वीडियो वायरल होते ही सोशल मीडिया पर लोगों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। कई यूजर्स ने इसे भ्रष्टाचार से जोड़ा, कुछ ने दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता से निष्पक्ष जांच की मांग की, तो कुछ ने कहा कि जो लोग अच्छा काम करते हैं उन्हें ही परेशान किया जाता है। दूसरी तरफ कई लोगों ने सावधानी बरतने की सलाह दी, क्योंकि एकतरफा वीडियो से पूरी तस्वीर नहीं बनती।
क्या शेल्टर अवैध था? बड़ा सवाल
बुलडोजर कार्रवाई के मामलों में अक्सर दो पक्ष होते हैं। प्रशासन का तर्क होता है कि निर्माण बिना अनुमति या नियमों के खिलाफ था। निर्माण करने वाले का कहना होता है कि जमीन उसकी है और कार्रवाई मनमानी थी। इस मामले में अभी यह साफ नहीं है कि:
- जमीन के मालिकाना दस्तावेज क्या कहते हैं
- निर्माण के लिए जरूरी अनुमति ली गई थी या नहीं
- नगर निगम ने किस आदेश के तहत कार्रवाई की
- कार्रवाई से पहले कोई नोटिस जारी हुआ या नहीं
इन सवालों के जवाब सिर्फ आधिकारिक रिकॉर्ड से मिल सकते हैं। यदि निर्माण नियमों के विरुद्ध भी था, तब भी कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है। नोटिस देना और जवाब का मौका मिलना इसी प्रक्रिया का हिस्सा है। देश की अदालतें भी बार-बार कह चुकी हैं कि ध्वस्तीकरण में उचित प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।
70 लाख का नुकसान और कानूनी रास्ता
जागृति ने कानूनी कार्रवाई की बात कही है। यदि वह अदालत जाती हैं तो निर्माण की लागत, दस्तावेज और दान से जुटाई गई राशि का हिसाब अहम होगा। दूसरी ओर, रिश्वत मांगने के आरोप की जांच के लिए भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसियां या वरिष्ठ अधिकारी स्वतंत्र पड़ताल कर सकते हैं। सबूत जैसे कॉल रिकॉर्ड, संदेश या गवाह मिलने पर ही आरोप टिक पाएंगे।
इस मामले से क्या सीख मिलती है?
पहली बात, किसी भी विवाद में वायरल वीडियो से फैसला नहीं करना चाहिए। दूसरी, सरकारी कार्रवाई पारदर्शी और नियमों के अनुसार होनी चाहिए, चाहे निर्माण किसी का भी हो। तीसरी, सामाजिक काम करने वालों को भी जरूरी अनुमतियां और दस्तावेज पहले से दुरुस्त रखने चाहिए, ताकि ऐसी स्थिति में उनका पक्ष मजबूत रहे।
निष्कर्ष
जागृति मिश्रा के शेल्टर पर बुलडोजर चलना एक संवेदनशील मामला है, जिसमें एक तरफ घायल जानवरों के लिए काम करने वाली कार्यकर्ता के गंभीर आरोप हैं और दूसरी तरफ प्रशासन का अभी तक न आया पक्ष। सच क्या है, यह नोटिस, अनुमति, जमीन के कागजात और जांच की रिपोर्ट सामने आने पर ही तय होगा। तब तक जरूरी है कि निष्पक्ष जांच हो, सभी पक्षों को सुना जाए और बेजुबानों के लिए काम करने वालों के साथ कानून के दायरे में न्याय हो।
